अरे यह क्या हो गया ? हमें तो चांटे खाकर अपनी दूसरी गाल आगे बढानी आती थी। ऐसा लगता है अब हमने गाल आगे बढ़ाने की जगह चांटे मारने सीख लिया। नम्रता को बुजदिली समझने की गलती ना करें।
लड़ाई एक बात होती है चिकोटी काटनी एक दूसरी प्रक्रिया है। दर्द और परेशानी दोनों में सहने होते हैं। जिस बच्चे में सामने से लड़ने की क्षमता नहीं होती वह चिकोटी से काम चलाता है।
हद तो तब होती है जब वह पलटकर पूछें कुछ हुआ क्या ? एकदम भोला सा चेहरा लिए चिकोटी काट प्रक्रिया से अपने आप को अनजान दिखाता है। अक्सर उसके मासूम चेहरे से हमें भ्रम भी हो जाया करते हैं।
मेरी दादी अक्सर सांप को देखकर कहती थी--घबराओ नहीं यह हरहरा सांप है यह जहर रहते हुए भी किसी को तब तक नहीं काटता जब तक छेड़ा न जाए। मन में एक प्रश्न आता है, और छेड़ने पर???
जबाब मिल गया -- छोड़ता नहीं।
आज हम खुश हैं बहुत खुश हैं सभी हमारे साथ है। मैं समझ नहीं पा रही पहले सभी हमारे साथ नहीं थे ? बाहरी शक्ति हमारा साथ दे सकती ,मनोवल बढ़ा सकती लेकिन सांप का फन  कुचलने के लिए अपने पैरों में ताकत और दिल में हौसले और जुधजु चाहिए।
काश ! यह आजादी हमें भगतसिंह और सुभाष चन्द्र बोस ने दिलवाई होती तो हम दुश्मनों के आगे अपने दूसरे गाल बढ़ानी नहीं पलटकर चांटा मारने सीखें होते।
खैर कोई बात नहीं अब हमने ईट का जवाब पत्थर से देना सीख लिया।