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तन और मन का अलग -अलग दर्शन

 

आज़ उस नटखट का दर्शन हुआ

आज अपने आप में खो जाना फिर अच्छा लगा।

आती-जाती सांसों कों देखते जाना अच्छा लगा।

दिल में धधकती आग को बुझाने के लिए,

लयबद्ध सांसें चल रही वगैर रुके वगैर थके।


आप कहना चाहते तो कहें सिर्फ मेडिटेशन इसे,

हमें तो तन और मन का अलग-अलग दर्शन हुआ।


खुली आंखों से देखना था  नामुमकीन जिसे,

बंद आंखों से आज उस नटखट का दर्शन हुआ।


(2)


पतझड़ के बाद पेड़ में पत्तों का आना अच्छा लगा।

आज फिर हमें वृक्ष के पत्तों को गीनना अच्छा लगा।


यज्ञ में खुद अपनी ही आहुति देने के बाद,

मेरा आपकी स्मृति में रहना अच्छा लगा।


आप चाहें जो कहो, हमें तो बहुत अच्छा लगा।

समझा था अपना उनका बेगानापन अच्छा लगा।


सारे संसार से तो कर ली थी दोस्ती हमने,

मेरा मन ही आखिर में मेरा दुश्मन निकला।


वादा कर ना आने की तेरी अदा,

वादाखिलाफी थी या नहीं तुम जानो।

मुझको तो तेरी ऐ अदा बहुत प्यारा लगा।

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