अंदर का शोर(1)
मुस्कान के पीछे की छुपी थकान,
जब भावनाएं मजाक बन जाती है।
दर्द कमजोरी और अकेलापन से,
इंसान मशीन बन जाता है,
प्यार नहीं फ़र्ज़ निभाता है।
जब किसी के जज़्बात को,
अल्फाज़ समझा जाता है।
जहां जज़्बात को अल्फ़ाज़ समझा जाता है।
वहां इंसान सिर्फ मशीन बनकर रह जाता है।
प्यार, प्यार नहीं बस फ़र्ज़ बनकर रह जाता है।
समझौते पर जी गई जिंदगी,
मौत के आगोश में ले जाती है।
इंसान मशीन बन जाता है।
प्यार नहीं बस फ़र्ज़ निभाता है।
जब अंदर टूटने का शोर बाहर तक आती है।
भावनाएं मज़ाक बन जाती है।
रेशमी कफ़न श्रृंगार बन जाती है।
नज़रों से उतरने वाले जीते-जी मर जाते हैं।
(2)
मेरे अल्फ़ाज़ से मेरे भीतर देख ना पाओगे।
बड़े नादान हो ताउम्र हमें समझ ना पाओगे।
अंदर टूटने के शोर को अट्टहास समझते हो।
समझौते पर जीने वाले को जिंदा समझते हो।
मुझे ताज्जुब ना हुआ।
तुमने मेरा नाम जो पूछा?
अपने आप को मेरा आईना कहने वाला।
चेहरा बदलते आईना भी पहचान भूल गया।
बीत गई सो बीत गई, छोड़ों उसको जाने दो।
बची जिंदगी के लम्हों से अब तो प्यार कर लो।
आप हमारी पहुंच से बहुत दूर हो फिर भी,
तेरे किए हरेक वादे पर हम विश्वास करते हैं।
उम्र हो चली बुढ़ापे का इस्तकबाल करते हैं।
तुम आ जाना हमें देखने हम इंतजार करते है।
मरने से पहले थमा देना, कागज़ कलम मुझे।
सलाम करनेवाले तुझे हम दुआ देकर मरते हैं।
उपरवाले ने जो कुछ दिया अथवा छीन लिया,
हम ऊपरवाले का शुक्रिया बारम्बार करते हैं।

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