प्रेयसी किसी और का सिंदूर जब माथे पर सजाती है।
डाल गले में वर माला किसी और को वरण करती है।
तब तकिया से मुंह ढककर मर्द भी सिसकी लेते हैं।
घर छोड़ जब मर्द रोटी कमाने बड़े शहरों में जाते हैं।
विदा करने आए मां- बाप को पैर छूते आंसू छुपाते हैं।
हंस- हंसकर हाथ हिलाते हैं और भीतर- भीतर रोते हैं।
पहुंच अपने गंतव्य पर मर्द भी तकिया भिगोते रहते हैं।
(2)
दिन भर कार्मों में लगा रात में मै कागज़ भरता हूं।
जब सारी दुनिया सोती है मैं आहे भरता रहता हूं।
एक भ्रम टूटा तो एक और भ्रम मुझको घेर लिया।
तुम वो नहीं थे फिर कौन था उसको ढूंढा करता हूं।
(2)
तेरा ख्याल जेहन से निकालने के बाद।
मुस्कुराया😊 हूं मैं आज ज़माने के बाद।
बंदिशें मुहब्बत क्या चीज होती है।
नसीहत देनेवाले दर्द और बढ़ा देते हैं।
दर्देदिल की शायरी लिखने की फरमाइश तेरी। 🥲
अब नज़र अंदाज़ करने की हुनर सीख ली मैंने।😂
(3)
रिश्ते कभी टूटते नहीं बस ---
कभी हम आदतन चुप हो जाते हैं।
और कभी दूसरे को चुप देखकर,
खामोशी की चादर ओढ़ लेते हैं।
रिश्ते खामोशी में यूं दब जाते हैं।
रिश्ते खामोशी में नहीं पलते।
दिल की दूरी उसे बढ़ने नहीं देती।
उपेक्षा उसे टिकने नहीं देती।
भावनाएं दिल में दम तोड़ देती है।
कितनी बातें अनकही रह जाती है।
(4 )
दिल की धड़कन में बसने वाले भी,
कहीं और जाकर बसेरा ढूंढ लेते हैं।
साथ चलने वाले जब रास्ते बदल लेते हैं।
आप उस मोड़ पर ही ठहरे रह जाते हैं।

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