मुक्ति की चाह थी चलो मुक्त करता हूं।
कहां जाना है मुझे बैठकर सोचता हूं।
सोचा ना था वो फैसला करना पड़ा है।
वर्तमान छोड़ भूत में हमें चलना पड़ा है।
भविष्य में जाने से मैं अब डरने लगा हूं।
कुछ भी सोचा हुआ नहीं कर पा रहा हूं।
जिसे चाहा हर पल उसे मैं खोता रहा हूं।
दिल टूटा नहीं पर दरका सा लग रहा है।
मैं खुद से ही बार-बार मात खाता रहा।
सदमे से उबरता रहा ज़ख्म भरता रहा।
कुछ सोचा हुआ नहीं कर पा रहा।
पहले भी कई बार था घायल हुआ।
ऐसा जीवन में आया प्रलय है ऐसा सखे।
तुमसे बिछड़ने का गम खा रहा है सखे।
तेरा साथ ही क्या छूटा मैं अकेला हुआ।
इसबार लगता नहीं ज़ख्म भरता हुआ

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