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आवाज खोना भी भयावह

 


किसीको खोने से भी भयावह होता है।

सुकून भरी उस एक आवाज़ का खोना।

जो पत्थर को भी भगवान बना डाले,

उस आस्था और विश्वास का खोना।


आजमाय को आजमाया करना गुनाह है।

लौट कर आए तो भरोसा करना गुनाह है।


बड़ी मुश्किल से दड़का दिल संभलता है।

उसे फिर से उसे यूं तब्बाह करना गुनाह है।


ऐसा प्रलय जीवन में आया है सखे,  

तेरे बिछड़ने का ग़म खा रहा है सखे।

 

तेरा साथ क्या छूटा, मैं अकेला हुआ,  

इसबार लगता नहीं, ज़ख्म भरता हुआ।


(2)


एक स्त्री की दृष्टि से ---

वस्त्र के उस पार की स्त्री को कभी देखो,

बगैर देह उसकी समर्पित भावना को देखो।


प्रेम को देखने की नजरिया बदल कर देखो।

लज्जा गरिमा रहित समर्पित प्रेम को देखो।


स्त्री जिसके लिए किसी का खोना,

तो क्या ? सुकून देनेवाला----

आवाज का खोना भी भयावह होता है।


एक बार उसकी आत्मा को छूकर देखो।

अपने आप को पूर्ण महसूस कर के तो देखो।

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