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मेरी मैय्यत में जी भर रोया

 

मुट्ठी भर मिट्टी तेरा स्वीकार किया 

काले चश्मे में वो मेरी मैय्यत में नज़र आए।

मेरे से बहुत बावस्ता तो वो थे नहीं।

आंखों में उथलेपन ना नज़र आए।

चश्मे में बहुत कुछ छिपाते वो नज़र आए।

रिश्ते में गमी दिखाने का अंदाज उनका नया नहीं।

आंखों की बेदर्दी बेगानापन ना कोई समझ पाए।


मैं भी अनमने ढंग से कर लिया,

मुट्ठी भर मिट्टी उनका स्वीकार।


उस मुट्ठी भर मिट्टी में क्या था ?

प्यार या तिरस्कार ना समझ पाए।


मिट्टी में था आधा भाई,आधा दोस्त,

आधे सपने, आधे प्रेमी, आधे अपने,

केवल मिट्टी थी जो थी, पूरी की पूरी।


आने - जाने का यह सिलसिला,

यूं ही चलता रहा है, चलता रहेगा।


वस्त्र अब पुराने चिथड़े हो चले थे,

जगह- जगह से उधरे हुए थे।

ढेरों टांके उसमें लगे पड़े थे।


कितने तुरपाई कर मैंने जीया था।

जाने कितनी बार उसे मैंने सिला था।


नया वस्त्र ना जाने कब? कैसा मिलेगा?

सोचता हुआ मैं और मेरा मन चला था।


काले चश्मे में शायद वो भी जी भर रोया था,

अपनी कसम निभाने को दूर से देख रहा था।

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