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Hamne dhero sapan sajaye

     


 नींद खुली तो यह जाना 

मेहनत से कल जो नीड़ बनाया था, 

पल भर में बिखर गया तूफ़ानो से।

मिलन हुआ तुमसे तो हमने ढ़ेरों स्वप्न सजा डाले,

आकर्षक था तन का या मन का समझ नहीं पाए।


जन्म-जन्म के बंधन पर हम विश्वास कैसे कर पाए।

भावों की इस आतुरता में मन को नहीं समझा पाए।


आकर्षक था तन का या मन का समझ नहीं पाए।

देह की मृगतृष्णा में हृदय का भाव ना समझ पाए।


स्वर्ग-सुखों की चाहत लिए मन को समझा नहीं पाए।

कितनी जल्दी लगा जलाने देह मृगतृष्णा की आग हमें।


मन के धिक्कारों से हुआ, उत्पन्न तत्क्षण वैराग्य हमें।

घर त्याग बैरागी बनाए या गृहस्थी त्याग बनाए बैरागी।


सब कुछ उसका रचा हुआ है समझ जाओ जीवनधारी।

अंह के मद में चूर हो हमने खुद को ही कर्ताधर्ता माना,

बस में अपने कुछ भी नहीं है नींद खुली तो यह जाना।



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