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Kisko sunaye dard apna

 

Bas yehi to kavi hriday ka durgun hai 

स्त्री पहचानती है, दूर से स्पर्श को,

ज़माने ने कहा यह कैसी कविता है?


मैंने फिर कहा - मैंने जीया है कविता,

झूठ जंचता ही नहीं, सच स्वीकार नहीं,

बस यहीं तो कवि हृदय का दुर्गुण है।


धरती को आकाश कभी नभ को धरा बता दें।

आपके भीतर छुपे गम सामने लाकर रुला दें।

आंसू से धो- धोकर दर्द मन को हल्का बना दें।


कविता की प्रस्तुति में छुपाकर रखने से अपना दर्द।

स्वाभाविक है टूटना बिखड़ना समेटना अपना मन।


कविता समेट लेती है सबके मन की पीड़,

नवजात शिशु को जैसे मिल जाए मां का क्षीर।


याद दिलाती है कविता जिसे भूल चुका संसार।

गांव की सोंधी-सोंधी मिट्टी के आहों का संवाद।


बांट जोहता बूढ़ा बरगद लगता जैसे हो अभिशप्त।

प्रस्तुत करती प्रसूता के पीड़,जिसकी टूटे सपने सारे।

किसको सुनाएं दर्द अपना रोएं तो रोएं किसके आगे।


किस्मत को कोसे या कर्म का लेखा- जोखा का हिसाब देखें।

ध्वस्त हो चुके अपने सारे सपनों का कफ़न उठाकर झांके।

बचपन बीता गई जवानी बुढ़ापे में हाथ-पैर भी जब कांपे।


हर आहट पर बूढ़ी मां बार- बार मोबाइल में जाकर झांके।

बेटा बहु सात समंदर पार बेटियां विदा हो चली साजन द्वार।

जेवर बेच पढ़ाया, गिरवी रख किया जिसने कन्यादान।


गीले में सो सूखे में सुलाने वाले हाथ का करती कविता उल्लेख।

रोटी पड़ी थाल में कान रिंगटोन सुनने को बेचैन। रोटी को भिगोते जाते अश्रुपूरित उनके दोनों नयन।


 कविता ना हो तो कहो करेगा कौन उनका गुणगान।

फ़ुरसत कहां है करें जो कोई बूढ़े बरगद का उल्लेख।

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