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Gulak me rakhe riste

 


जब-जब बेचैनी से घिर उठता है मन,

जब-जब बेचैनी से घिर उठता है मन

मद्धिम पड़ जाती है आंखों की रोशनी। 

दिल अनजाने आशंकाओं से घिर जाता है।

बदल जाता है उसके धड़कने का अंदाज।


गुल्लक में सम्भाल रखा था रिश्ते को,

मैंने सोच रखा था सारे के सारे अपने है, 

जब गुल्लक तोड़ा तो मुझे अहसास हुआ,

रिश्ता कोई भी शाश्वत नहीं निकला।


बुझे चिरागों से रोशनी नहीं मिलती।

महफ़िल में जरा जाने से पहले सोच लो।

जो मिलता है दिल को सुकून तन्हाइयों में,

भरे महफिल में नहीं मिलती है।


शिकायतों से जिंदगी नहीं चलती,

उम्र बीत जाती है घरौंदा बनाने में,

लगता है अभी जिंदगी बची है बहुत,

कोई आकर मुझे कलम रोशनाई तो दे।


ठहर कर देखते हैं कुछ दिन उनके शहर में,

सुना है उनके शहर में रुसवाइयां नहीं मिलती।





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