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| Marham khud lagate hai |
तेरे दिए हरेक गम मेरे लिए हार बन जाते हैं,
जब एक-एक आंसू को मैं धागे में पिरोती हूं।
माला जब मेरे गले का हार बन दिल पर चढ़ जातें हैं।
दिल को मुहब्बत का असली अर्थ बताते हैं।
आंखों में संजोए सपने बिखरने से बचाने को,
हम आंसू के हरेक मोती को सबसे छुपाते हैं।
हम वो हैं जो ज़ख्म खाकर भी संभलते नहीं।
मरहम खुद लगाते हैं, फिर से ज़ख्म पाते है।
गरीबी इस कदर हावी होती है गरीबों पर,
ज़हर खरीदने का पैसा भी उधार से लाते हैं।
इतना कुछ होने पर भी मन ठहाके लगाता है जब,
मिलावटी ज़हर खाकर भी खुद को जिंदा पाता है।
जिंदगी ख़ामोशी से सब देखती चलती जाती है।
मेरी बेबकुफी समझ, उसका मज़ाक़ उड़ाती है।

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