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Prem peer sang hua Savybar

Bujhe chirago se Roshani mangi

 स्वर्ग- सुखों की चाहत थी,

प्रेम पीर संग हुआ स्वंयवर।


जन्म -जन्म के संबंधों पर,

मैंने आंख मूंद किया विश्वास ।


देह आकर्षक में ही छुपा था,

इस स्वंयवर का अनूठा राज।


मृगतृष्णा में उलझ कर रह गया,

सुनहरे जीवन जीने का सार।


मन का अंधेरा दूर करने को,

बुझे चिरागों से मांगी रोशनी।


बहुत जलाएगी उम्र भर,

मन को तड़पाने की ऐ आग।


वितृष्णा से मन में हुआ उत्पन्न वैराग्य।


(2)


माफ़ कर दिया सबको मनाना छोड़ दिया,

हमने अपनो को अपना कहना छोड़ दिया।


परवाह अब भी करती हूं सबकी,

बस अपना हक जताना छोड़ दिया।


जिस गुलशन में उनके पांव में थे छाले पड़े,

अलविदा कह गुलशन को जाना छोड़ दिया।


(3)


लिखा तो बहुत बस पढ़ने वाला चाहिए।

इंसान को इंसान समझने वाला चाहिए।


कितना चाहता है कोई कहने की जरूरत क्या?

खामोश जुबां की भाषा समझने वाला चाहिए।


रंगहीन, गंधहीन स्वादहीन को भी कोई,

रंग,गंध और स्वाद भरने वाला चाहिए।


अपनों के साथ ज़ीने की तमन्ना सबकी होती है।

कौन जानता नहीं एक दिन जाना अकेले ही है।

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