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Kagaz Kalam kuch tasveer


 बचपन के साथ कितना कुछ खिसक गया

खिलौनों सारे रह गए बचपन निकल गया।

दोस्त तेरे वगैर खालीपन जीवन में भर गया।


वो अल्हड़पन,चाहत, वो ख्वाब कहां चले गए।

मन के खालीपन में अनिच्छा घर जो कर गए।


मेरा अस्तित्व भी था? रीठ की हड्डी थी कहीं?

जिस राह पर चले हम, फिसलते ही चले गए।


अपने सर पर चढ़ाने वाला जाने कहां गया।

अपना अस्तित्व खुद से पहचाना नहीं गया।


इतना झुकाया खुद को, रीठ की हड्डी मेरी,

अपने स्थान से खिसकती ही चली गयी।


मारा ना अपने आप को ज़हर भी ना पीया।

बार-बार टूटता बिखरता समेटता ही रह गया।


कितने बड़े अदाकारा हैं समझने के लिए।

चेहरे को छोड़िए उसके चक्षुओं में झांकिए।


आप आएंगे तो पाएंगे मेरे गरीब खाने में।

कागज़ कलम कुछ तस्वीरें है बूतखाने में

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