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| रुह में जो बसे नहीं |
ब्रह्माण्ड कितना निर्दयी है,
जिसे ले गया उसे ले गया।
ब्रह्माण्ड को लौटाने का नहीं अधिकार है।
भावनाएं उसे पाने की ज़िद नहीं छोड़ता,
पुनर्जन्म की सांत्वना देना उसका काम है।
अगले जन्म में उससे मिला दे चमत्कार हैं।
निर्दयी निष्ठुर ब्रह्माण्ड स्मृति छीन लौटाता है।
हर जन्म में इंसान की फितरत बदल जाती है।
जहां से चले थे, वहां कहां वह पहुंच पाता है?
पूर्व जन्म का रिश्ता भी कोई रिश्ता है।
दिल से अपना नहीं, गैरों में शामिल नहीं।
रूह में जो बसे नहीं प्यार कब कहलाता है।

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