आंसू रोक अपने को सशक्त दिखाता
वैसे तो वह साधारण सा इंसान हैं,
देह के पार देखो तो पूरा ब्रह्माण्ड दिखता है।
कोई कर ही नहीं पाता है...ऐसे इंसान से प्रेम,
जिसके भीतर जीवित स्वाभिमान दिखता है।
खामोशी में बोलती है आंखें,
चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान है।
बेबात बच्चों सी खिलखिलाहट,
अपने भीतर छुपाए टूटने का अपमान।
अभिमान स्वाभिमान दो है एक नहीं,
एक त्याज्य है, दूसरा कतई नहीं।
ज्ञात था फिर भी वह न्योछावर कर बैठा।
एक शब्द क्या त्यागा मौन को ओढ़ बैठा।
प्रेम में अपना कुछ होता ही नहीं है,
यह समझना ही तो उसका भूल था।
भीतर की ज्वाला ही जला देगी अंह,
निखार देगी कुन्दन सा सुनहरा रंग।
बेवजह हंसना बताता है कितना भोला है,
आंसू रोक अपने को सशक्त दिखाता है।
उसे आज भी सर रख रोने वाले कंधे की तलाश है।
युद्ध,संघर्ष,संग्राम से नहीं भीतरी द्वन्द से परेशान हैं।

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