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डरपोक का आपरेशन

 आपबीती--


मेरे गले में एक गांठ सी पड़ गई। अब हर आदमी कुछ ना कुछ अपना सलाह देकर चला जाता 😀 हमारी आदत है-- हमारे यहां हर कोई डॉक्टर है। मैं ऐसा सोचती हूं कि हर कोई यहां छोटा-मोटा डॉक्टर ही है।

अब हर कोई कुछ ना कुछ सजेस्ट करें कोई यह लगा लो, तो वह लगा लो तो चूना लगा कर देखो तो यह दवा लगा कर देखो तो खत्म हो जाएगा। ऐसा बहुत सारा सजेशन आना शुरू हो गया-- किसी का कहना था कि होम्योपैथी में दिखलाओ तो किसी ने कहा कि नहीं मैडम डर की बात है, गले में है गले के ऊपर मटर के दाने जितने उभार आ गए हैं। यह डेंजरस भी हो सकता है इसलिए इसको आप हॉस्पिटल में जाकर के दिखला दीजिए। 

मुझे कोई दर्द दे नहीं रहा था तो मैं डॉक्टर के पास जाने से मना कर रही थी।

 घर वालों के दबाव में डॉक्टर के यहां जाने की मुसीबत चलो कोई बात नहीं है।

डॉक्टर ने भी कोई खास कुछ किया नहीं उसने कहा ऐसा कुछ नहीं है लग रहा है। कुछ दवा दे दिया और इसके बाद हम लोगों को वहां से छोड़ दिया गया।


 15-20 दिन बाद गांठ में दर्द होना शुरू हुआ, दर्द धीरे- धीरे जब बढ़ता चला गया। डाक्टर के पास जाने के भय से दो-चार दिन तक किसी तरह से मैंने उसे सबसे छुपा कर बर्दाश्त किया ताकि लोग फिर से डॉक्टर के पास ना ले जाए। 

दर्द घर में घर वालों से छुपाना मुश्किल काम है और लोगों को पता चल गया कि काफी दर्द बढ़ गया है। डॉक्टर के यहां अस्पताल लेकर चले। बच्चे घर में रह गए और हम दोनों पति-पत्नी डॉक्टर के यहां।


 डॉक्टर ने जांच करने के बाद कंपाउंडर को बुलाया और उससे कुछ कहा फिर हम लोगों को कंपाउंडर के रूम में जाने के लिए कहा।


यहां तक तो सब ठीक-ठाक ही चल रहा था मैं भी दर्द से छुटकारा पाना चाहती थी। सोचा चलो इलाज हो रहा है तो सब सही हो जाएगा ऐसे भाव मन में रखते हुए मैं कंपाउंड वाले रूम में गई।

 

वहां मैंने देखा कि कंपाउंडर अपने औजार साफ करने शुरू कर दी है।

 मैं चुपचाप से देख रही थी - मैं इंजेक्शन से भी कोसों दूर भागती हूं।

एक बूंद खून भी मैं किसी का नहीं देख सकती फिल्म वगैरा देखने में भी अगर कहीं कुछ ऐसा समय आता है, तो मैं अपने सर को दूसरे तरफ मोड़ लिया करती हूं। 

भगवान जाने क्या होगा डर के मारे मेरे हाथ पैर सुन्न हो रहे थे। 

कंपाउंड को मैंने देखा एक हाथ में कोई औजार लेकर मेरे तरफ बढ़ रहा है और अपना हाथ मेरे गले के गांठ के ऊपर ले जाने की कोशिश कर रहा है ।


मैंने उसके हाथ को कसकर पकड़ लिया और थोड़ी देर वह शांत रहा फिर समझाते हुए बोला-- देखिए ज्यादा दर्द नहीं होगा, मैं इसको अभी ठीक कर दूंगा। लेकिन मैं कहां मानने वाली थी मेरे प्राण सूख रहे थे। मुझे ना छोड़ना था ना मैंने उसके हाथ को नहीं छोड़ा ।

किसी तरह से कंपाउंडर ने फिर से दोबारा अपना हाथ गले की तरफ बढ़ाया और मैं फिर से उसे उसके हाथ को पकड़ के उसको थोड़ी सी धक्का दे दी अब वह लड़खड़ाते हुए थोड़ा सा पीछे की तरफ मुड़ गया। 

वह चिढ़ गया ऐसा लगता था जैसे बहुत गुस्से में था-- मेरे तरफ मुंहखातीब होते हुए बोला - हद हो गई मैं आज तक आप जैसी औरत नहीं देखा।


मैंने कहा -- आप देखोगे भी नहीं, क्योंकि मेरे जैसी कोई औरत पैदा ही हुई है। यह कहते हुए मैं रूम से बाहर आ गई यहां तक की दोबारा डॉक्टर से भी मिलने अंदर नहीं गई। 


घर आने पर बच्चों ने सोचा कि मेरा ऑपरेशन होकर आ रहा है सब दौड़ कर मेरे पास पहुंचे।

वहां देखा तो मैं जैसे गई थी वैसे ही वापस आ गई। 

बच्चों के पूछने पर की क्या हुआ ?

मेरे पतिदेव ने जवाब दिया कि मुझसे क्या पूछते हो? अपनी मां से पूछो।


दर्द तो मुझे अभी हो रहा था, मैं कमरे में जाकर लेट गई। मैं समझ गई थी कि सब हमसे नाराज हो गए हैं चुपचाप आकर बिछावन पकड़ना ही उचित समझा।

 

दो-तीन घंटे बाद जब शाम हुई तो मेरे पड़ोसी सपत्नी मेरा हाल- चाल पूछने हैं आए। उनके सामने मैं अपराधी के समान आकर बैठ गई।

फिर वही सवाल सामने आया है क्या---मैडम आपका ऑपरेशन हुआ?

 मैं क्या जवाब देती मैं पतिदेव की तरफ अपनी नजर उठाई लेकिन इस बार वह चुप नहीं रहे।

उन्होंने कहा कि नहीं अरे यह वहां से डरकर भाग आई। 

थोड़ी देर तक सब ख़ामोश बने रहे , फिर मेरी पड़ोसन मेरे करीब आई और बोली-- देखूं तो मैडम यह कैसा है ? 

ऐसा कह कर उन्होंने मेरे गार्डन के चारों तरफ उंगली से हल्का-हल्का सहलाते हुए बात करती रही मैडम यह तो पक गया है, लगता है इसमें मवाद आ गया है। आपको बहुत दर्द कर रहा होगा। उनका धीरे-धीरे सहलाना मुझे सुकून दे रहा था।

 एकाएक वह गाठ को पकड़ ली और कस कर दबा दिया। गुब्बारा फूटा फटाक👍उन्होंने मुझे ना सोचने का समय दिया ना दर्द को महसूस करने का समय।

मैं कुछ बोलती उससे पहले घाव फट चुका था उसमें से मवाद और खून बाहर आ रहे थे। असहनीय पीड़ा का अंत हो चुका था। 

मैंने उन्हें दिल से धन्यवाद दिया क्योंकि जैसे ही घाव फूटा वैसे ही सारे दर्द जाने कहां विलीन हो गए। मेरी पड़ोसन के वो शब्द आज़ भी याद है - मैडम इस तरह के सैकड़ो घाव मैंने अपने गांव में लोगों के ठीक किए हैं। 

मैं उनकी बात सुन रही थी 🤔 मैंने उनपर विश्वास किया था, उन्होंने मेरे दर्द करते हुए हिस्से पर कठोरता से प्रहार किया? तो क्या???

"विश्वासघात कर भी कष्टों से छुटकारा दिलवाया जा सकता है।"

 

😂  लोगों के मन में जो भ्रम पैदा हो गया था कि कहीं यह कैंसर तो नहीं तो यह कैंसर नहीं यह एक छोटा-मोटा घाव निकला।


 फिर से मुझे डरपोक का ऐसा 😂खिताब दे गया।

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