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Har Misare me tu tha |
मैं टूटा था सेहरे की चकाचौंध में,
तेरे नाम की लौ बुझी थी भीतर कहीं।
पर हर ग़ज़ल जो मैंने लिखी,
तेरे अधूरे अल्फ़ाज़ से ही बनी।
तेरे जाने के बाद भी जो लिखा,
वो तुम ही तुम थी हर मिसरे में।
और अब, जब तुम सामने नहीं हो —
खुद को समेटने की हिम्मत जुटा रहा।
मैं चली थी इश्क़ छोड़ कर,
पर वो कभी छूटा ही नहीं।
हर कविता जो मैंने बुन ली,
तेरे मौन से ही रची गई कहीं।
तेरी आवाज़ आज मेरे पास है,
शिकायत नहीं, बस आभार है।
जो तू नहीं कह सका, वो मैं सुनती रही,
अब सुनाने की बारी मेरी है —
प्यार की आख़िरी गवाही बाकी है।
हम अधूरे थे,
पर कविता में पूरे थे।
शब्दों के पुल ने------- देखो कैसे?
अधूरे को पूरा बना दिया।
जिससे दो दिल फिर एक राह पर चल पड़े।
डोली में तुझे देख उस पल,
महसूस हुआ तू मेरी ना रही।
तेरे दिल में मेरी जगह ना रही।
मुहब्बत चाहे मुकम्मल नहीं हुई —
लेकिन अब----
साथ रहकर साथ नही,
दूर रहकर तो साथ है।
अधूरापन भी अपना सा लगता है।
हमें हर मिसरे में तू ही तू दिखता है।
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