"अब मैं अपनी सुनती हूँ"
कभी सबकी सुनती थी,
हर बात को मन में बुनती थी।
सलाहों की सीढ़ियाँ चढ़ती रही,
पर मंज़िल कहीं गुम सी लगती रही।
कानों में गूंजते रहे आदेश,
हर स्वर में छुपा एक विशेष।
"ऐसे चलो", "वैसे रहो",
मैं बस चुपचाप सहती रही।
पर एक दिन भीतर कुछ टूटा,
एक मौन ने मुझसे पूछा —
"क्या तूने खुद को कभी सुना?"
और मैं ठहर गई, पहली बार।
अब मैं अपनी सुनती हूँ,
भीतर की ध्वनि को चुनती हूँ।
न समाज की जंजीरें, न परंपरा की दीवार,
मेरे पाँव अब हैं मुक्त, मेरे विचार हैं साकार।
घमंडी कहो, या बग़ावती,
मैं अब नामों से नहीं डरती।
मैं इंसान हूँ, सामान नहीं,
जिसे दांव पर लगाया जाए कहीं।
मेरी चुप्पी अब शोर बन गई है,
मेरी चुप्पी अब ज़ोर बन गई है।
जो सुन न सके मेरी पुकार,
अब सुनें मेरी घोषणा बार-बार —
*"मैं अब किसी की नहीं सुनूंगी,
क्योंकि अब मैं अपनी सुनती हूँ।"?
अग्निपरीक्षा लेने वाले से, देने को कहती हूं।
जुए मे दांव पर अब मैं सवाल भी पूछती हूं।

0 Comments