स्वीकृति से सत्य तक
एक समय था जब मैं अपने विचारों को इस आधार पर परखती थी कि लोग उन्हें कितना स्वीकार या अस्वीकार करते हैं। मैं अक्सर रुक जाती थी, दूसरों की स्वीकृति का इंतज़ार करती थी—किसी के सिर हिलाने का, किसी के कहने का कि “हाँ, यह सही है।”आप सही है ''
मुझे लगता था कि अगर मेरे विचार से सब सहमत है तो वह उनमें मूल्यवान है अन्यथा नहीं।
मेरे विचार लोगों के लाइक- डिसलाइक पर पूर्णरूपेण आश्रित थे —ऐसा लग रहा मैं सत्य को जी नहीं रही थी। मैं सांस लेना अगर जिंदगी है तो शायद मैं जिंदा थी।
मेरी अपने आप में विश्वास की कमी दूसरे की स्वीकृति पर पूरी तरह उपस्थित थीं। मैं अपने शब्दों को इस तरह गढ़ने की कोशिश करती थी कि वे दूसरों को पसंद आएं। मैं अपने ध्वनि को नरम नरम रखना चाहती,अपने विश्वासों को हल्का करती, और कभी-कभी खुद को चुप भी कर लेती जहां से अस्वीकार किए जाने की आशंका हो—सिर्फ असुविधा या अस्वीकृति से बचने के लिए।
लेकिन अब कुछ बदलाव सा अनुभव किया है, बाहर से भीतर जाते हुए। मुझे एहसास हुआ कि स्पष्टता सबकी सहमति से नहीं आती। यह भीतर से आती है। जितना मैं अपने विचारों को दूसरों की अपेक्षाओं के अनुरूप करने की कोशिश करती, उतना ही मैं अपने आप पर विश्वास खोती जा रही थी,असली विश्वासों से दूर होती जा रही थी।
अब मैंने लोगों की स्वीकृति का पीछा करना छोड़ा और अपने भीतर की आवाज को सुनना शुरू किया, तो मुझे जो कुछ मिला: वह है आत्मविश्वास और शांति।
अब मैं लोगों को सहमत होने के लिए नहीं बोलती, बोलकर लोगो से शाबाशी की उम्मीद नहीं रखती। अब इसलिए बोलती हूं क्योंकि मैं अपने कहे पर विश्वास करती हूं। मैंने बचपन से सीखा भी तो यही था कि मुखर होना ज़ोर से बोलना नहीं है—यह ईमानदार होना है। यह अपने सत्य में खड़े रहना है, भले ही यह जज करने वाले के लिए कतई लोकप्रिय विषय न हो।
अब भी लोग मुझसे असहमत हो सकते हैं। यह ठीक है। क्योंकि अब मुझे अपने विचारों को महत्व देने के लिए सबकी स्वीकृति की ज़रूरत नहीं है। मैं और मेरे शब्द स्पष्ट, स्थिर, और आत्मविश्वास से भरे हुए होते है। मैं खुला हो गयी हूँ—न सिर्फ खुद को व्यक्त करने के लिए, बल्कि दूसरों को सुनने के लिए लेकिन बिना खुद को खोए। स्वीकृति पाने का भ्रम में अपने वजूद को खोने का दर्द दिल और दिमाग पर आघात करता है।
मैं कभी किसी को जज करने के झंझट में पड़ना नहीं चाहती, नाही किसी के द्वारा जज किया जाना पसंद है।
अंत मे उन सभी के लिए जिन्होंने कभी बोलने में हिचकिचाहट महसूस की है, जो सोचते हैं उनकी आवाज़ पर्याप्त है या नहीं ??—
मैं यह कहना चाहती हूं: है😊 आप पर्याप्त हैं। यदि आप खुद होने की अनुमति दूसरों से माँगना छोड़ देंगे, उसी क्षण आपको अपने आप पर, अपने वक्तव्य पर भरोसा होगा सच्ची स्वतंत्रता मिलेगी ।

0 Comments