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कर्म की काव्यात्मक अभिव्यक्ति


जीवन की काव्यात्मक अभिव्यक्ति


आंखें दीप बन, दिखाती जग का रंग,  

देखा जो आंखों से वही बनता है जीवन का ढंग।  

दृष्टि से ही जन्मते रहते सदा विचारों के बीज,  

बीज से कर्म उपजता, कर्म से अगला जन्म।  


कान हैं वह द्वार, जहाँ सब शब्द उतरते,  

श्रवण से ही विवेक और अज्ञान बिखरते।  

श्रवण करो सत्य को, मन निर्मल हो जाए,  

सुनो असत्य को, तो मन भ्रमित हो जाए।


अन्य सभी इन्द्रियां है देतीं अनुभव क्षणिक,  

स्पर्श, स्वाद, गंध—सुख- दुख के है निकष।

सोचो जरा कैसे यह 3% कर्म अपराधी बने। 

आत्मा की यात्रा मौन हो सत्य दृष्टि तय करें।


83+14 मिल Vision और Destiny तय करें।

जीवात्मा का जीवन मृत्यु चक्र का निर्णायक बने।

बाहर देखे भ्रमित करें, भीतर चले करें मुक्तिमय।

दृष्टि शुद्धि मन पवित्र करें, जीवन करें देवमय।

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