अब मैं, मैं नहीं रही जीवन के उत्तरार्ध में,
जीवन के उत्तरार्ध में मैं जो थी नहीं रही।
ज़िद,रुठना, मनाना,अधिकार शिकायत,
सबकी सब कहीं बहुत पीछे छूट गए।
खाली जगह भरने खामोश ज़ख़्म आ गए।
तुम आओगे जानती थी, मै इबादत व्यर्थ नहीं जाते।
वर्षों में हासिल किया अपमान दर्द सुनाए नहीं जाते।
प्रेम में स्वभावगत इंसान अधिकार समझ बैठता है।
उम्र की थकान सारी उम्मीदें ज़ख़्म खत्म कर देती है।
जिंदगी के इस मोड़ पर दिल में बस सुकून की आस है।
कहां थकी मुस्कान की जगह खिलखिलाहट की बात है।
तुम भी तो अब पहले जैसे नहीं दिखते मुझे चिढ़ाकर,
तेरी चमकती आंखों में वो पहले सी खुशी नहीं दिखती।
तुम्हारी हंसी की प्रतिध्वनि अब भी कानों तक आती है।
मैंने आखों में आंसू रोक रखें थे अब संभालें नहीं जाते।
मेरे अन्तस में संचित विश्वास भरोसा अभी भी शेष है।
समझौते पर हस्ताक्षर कर जिंदगी जी नहीं काटी जाती।
तुम्हारे पास शब्द नहीं तो तेरी खामोशी मैं पढ़ लूंगा।
सबसे छुपाकर रखी संवेदना को ज़हर समझ पी लूंगा
तुम्हारे अनकहे वादों की श्रृंखला भी संभाल रखा हूं।
तुम्हारी प्रेम में हंसकर विष को अमृत समझ पी लूंगा।
हो सकें तो तुम एकबार, फिर से जैसी थी बन जाना।
बस एक बार फिर से मै, चिढ़ाऊं तो तुम चिढ़ जाना।

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