आत्मा की पुकार मौन रही
अलौकिक नैतिक प्रेम भी जगत में,
कलयुग में अभिशाप बन जाएगा।
मित्र प्रेमियों के हाथों ही नारी तुम,
दैहिक तराजू पर तौली जाओगी।
पूर्ण समर्पण किसे चाहिए?
आत्मा का है कोई मोल नहीं।
यह शापित युग यहां सबके सब है देह पुजारी।
पूर्ण समर्पित होकर भी कुलच्छनी कहलाओगी।
माना अब तुम अबला नहीं हो,
कोमल ह्रदय अब भी है तेरा।
कहो इस मांस लोथड़े से बने मन,
को तुम कैसे पत्थर बनाओगी।
कितना दर्द सहोगी अपनों से घुटकर मर जाओगी,
भावविहिन संसार में अपना दर्द किसे दिखाओगी।
यहां देह के व्यापारी सभी है,
नश्वर शरीर का है मोल यहां।
गहन खामोशी में भी आत्मा तेरी चित्कारेगी।
पुरुषों की दुनिया में कृष्ण कहां तुम पाओगी।
धृतराष्ट्र की सभा में तुम चरित्रहीन कहलाओगी।
द्रोपदी कलयुग में कृष्ण सा सखा कहां तुम पाओगी

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