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Jate jate koi vajah chor jana

 




Bhir me bhi sanata

जाते-जाते एक वजह छोड़ जाना जरुर।

वज़ह जो भी जैसा भी हो सुकून देते हैं।


छोड़ने का वज़ह ना हो मन भटकता है।

पुराने दिनों में वज़ह तलाशता रहता है।


भीड़ में भी सन्नाटे आकर तंग करते हैं।

रात में अपनी ही ग़लती ढूंढता रहता है।


थक हार कर बाहर -भीतर से टूट जाता है।

मुहब्बत आने से पहले इत्तिला नहीं करती।


जात धर्म नाम गांव ठिकाना नहीं पूछा करती।

♥️अंधी होती है औकात भी देखा नहीं करती।


मुहब्बत बिना कुछ कहे चुपचाप चली आती हैं,

चुपके आकर दिल में अपना घर बना लेती है।


पूर्वजन्म के अधूरे प्यार के वंशीभूत वो आती है।

कर्मफल समाप्त होने पर वापस लौट जाती है।


उसका लौटना किसको कितना तोड़ जाता है।

बेवजह त्यागें जाने का दर्द,कहां जान पाती है।


कुछेक रिश्ते बदलते मौसम की तरह होते हैं।

समझ नहीं पाती सलामती की दुआ मांगती है।

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