बेटों की चाह में घर में आ जाती है बेटियां
बेटो की चाहत में घर में आ जाती है बेटियां।
इर्ष्या वगैर भाई जन्मोत्सव मनाती हैं बेटियां।
बेटी के बाद बेटा आए, घी से चिपोड़ी जाती है बेटियां।
भाई आने पर भाग्यशाली कही जाती है बेटियां।
भाई का जूठन प्रसाद समझ खाती है बेटियां।
मनौती मांग कर कहां? घर में आती है बेटियां।
पैरों में रुनझुन पायल पहन थिरकती है बेटियां।
कन्यापूजन के दिन ही बस पूजी जाती है बेटियां।
राखी बंधवाने, मां बहन को गाली सुनवाने के काम आती है बेटियां।
वंश चलाने के लिए पुत्ररत्न प्राप्ति के साधन मात्र होती है बेटियां।
कहने को तो सदा लक्ष्मी कहलाती है बेटियां।
पराया धन कहकर संबोधन पाती है बेटियां।
जन्मभूमि में भी पराई समझी जाती है बेटियां।
क्यों वस्तु समझ दान में दे दी जाती है बेटियां।
भाई को पढ़ाई, रसोईघर अपने आप पा जाती है बेटियां।
ससुराल में भी घर नहीं,मात्र रसोईघर ही पाती है बेटियां।
मोबाइल नोटिफिकेशन सा अनसुनी रह जाती है बेटियां।
आशिर्वाद में भी ख़ुश रहने की दुआं कहां पाती है बेटियां ?
सोशल मीडिया पर ट्रेंड कभी नहीं कर पाती हैं बेटियाँ।
चैट हिस्ट्री में मिटा दिए गए संदेशो- सी होती हैं बेटियां।
अपनी ही जन्मभूमि में पराई समझी जाती हैं बेटियाँ।
मैके में तो कभी ससुराल में बेमौत मारी जाती है बेटियां।

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