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Kismat thi kho Jane ki




अक्षत, रोली, चंदन से किया श्रृंगार भोले का,

हाथ गंगाजल भावपूर्ण मन ले आई मैं द्वार।

प्रेम सिद्धि का वरदान छुपा रखा था प्रभु,

किया शंकर सावन के तेरे सोलह सोमवार।

भृकुटी बीच बैठी बिन्दी सदा रहे सलामत,

महाकाल एक ही प्रार्थना थी देवालय में।


मन की रिक्तता भर दोगे मेरे भोले सावन में,

मनमीत दे जीवन परिपूर्ण करोगे सावन में।


प्रभो कब, कहां और क्या मुझसे भूल हुई,

इच्छित वर का परिछन ना घर- द्वार हुई।


औढरदानी कहो- क्यों मांग मेरी यूं रीत गई,

सावन बीता ना भींगा तन-मन विरहनी का।


सोमवार व्रती को बस तू इतना तो बतलाओ,

जो किया उचित था क्या मेरा भाग्य बनाने में।


मेरे भाव से अनभिज्ञ कहां थे तुम मेरे अंतर्यामी,

प्राप्ति के आधार तुम ,किस्मत थी खो जाने की।



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