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| Bhavnao ki bhi ek umar hoti |
अंदर तक तोड़ गई जब बेरुखी उनकी।
अपने भी मुझपर सवाल उठाने लगें हैं।
रस्सी गले से निकालकर हम जीने लगे हैं।
जिस्म की बात नहीं थी रुह को समेटना है।
मुश्किल बहुत था, पर हम समेटने लगे हैं।
इंतजार का शबब सर दर्द का कारण है।
भावनाओं की भी तो एक उम्र होती है।
मुकम्मल तौर पर दिखाई नहीं देती है।
आंखों की चमक प्रेम की शिद्दते बंया है।
उनके रुठने में प्यार की झलक मिलती है।
एकाकीपन सीख स्याह हुआ जब मन है।
अर्थहीन है सावन तेरी बदरी और बरसात।
साज- सजावट, हरी चुड़िया सब है बेकार।
साजन बिन कजरी बन गई कजरे की धार।

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