इतने सपने देख लिए,
अब तो सच भी सपना लगता है।
बगल में खड़ा इंसान भी,
मुझे मृगमरीचिका सा लगता है।
सूरत इतनी बदल गई,
आईना भी बेगाना सा लगता है।
आंखें धुंधलाने से यारो,
हमें सब चेहरा एक सा लगता है।
सपने की फितरत ऐसी है,
दिन हो या रात एक जैसा लगता है।
तुम लाख बदलो सरकार,
चोर-चोर मौसेरे भाई जैसा लगता है।
किसी की किसी से बनती नहीं,
पूर्व जन्म की दुश्मनी जैसा लगता है।
जिसे मिला हो फरिश्ता मनानेवाला,
हर वक्त बे-वक्त रुठा-रुठा सा रहता है।

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