Dil me sailav |
अनकहा सच भी मेरा झूठ सा लगता है।
कहते हुए गला सूखता सा लगता है।
मनाने की हर कोशिश मेरी नाकाम हो जाती है।
दिल में सैलाब बाहर वह मुस्कान लिए फिरता है।
कोई बेफ्रिकी वाली हंसी हंसता भी अच्छा लगता है।
तेरा मुझ पर ऐतबार नहीं करना भी अच्छा लगता है।
किसी का फिक्रमंद होना भी डंसता है।
हर पल तेरा ही एहसास प्यारा लगता है।
तू तो बेफ्रिकी वाली हंसी हंसता भी अच्छा लगता है।
ख्यालों में तुझे लाकर मुझे मुस्कराना अच्छा लगता है।
तू तो ख़फ़ा- खफा भी अच्छा लगता है।
तेरे खातिर तुझे छोड़ना भी अच्छा लगता है।
अलविदा कह तो दिया पर यार तू गया कहां है?
मेरी कहानी पढ़ तो ली तूने पर समझा कहां है?
उम्र के आखिरी पड़ाव तक साथ रहने की ख़्वाहिश नहीं।
तेरा बेगैरत कहना खलता तो है, फिर भी अच्छा लगता है।
ख़ुद का कत्ल कर मुझे कातिल कहना अच्छा लगता है।
इल्जाम ही कुछ ऐसा है मेरा संवरना मुश्किल लगता है।

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