![]() |
| हमें अपनी औकात मालूम है |
हमें अपनी औकात मालूम है,
अक्सर राह में चलते-चलते हम,
घमंडियों के लिए रास्ता छोड़ देते हैं।
कुछेक शेर लिखते नहीं है हम,
महसूस करने के लिए छोड़ देते हैं।
जो कभी पढ़ने भी नहीं आते हैं हमें,
उनके लिए शिकायत मेरे नहीं होते।
जो आते-जाते पढ़ते हैं अखबार की तरह,
उंगली की छाप ना छोड़े उसे हंम भूल जाते हैं।
( 2 )नहीं लिखूंगी, मैं अपनी जीत के किस्से,
तुम्हारी जीत को, मैं सरेआम लिखूंगी।
छुपा लूंगी मैं अपनी सिसकियां तकियों में।
तुमको हजारों बेबसी में खड़ा चट्टान लिखूंगी।
मौका मिला तो मैं तेरा स्वाभिमान लिखूंगी।
तुमको मजबूत कंधों में छुपा इंसान लिखूंगी।
खामोशी से खो गए नि: शब्द, एकांत जीवन में,
देखा ना कोई तमाम उम्र ऐसा किरदार लिखूंगी।
चट्टान बनकर तूने इस शहर के सैलाब को रोका।
पतझड़ में आए बहार या सावन की फुहार लिखूंगी।
जिंदगी में पहली बार तेरा मैंने वो हूनर देखा।
लहज़े में बदलाव ना लाते तो शहर डूब गया होता।

0 Comments