
Dharm Arth Kaam Moksh
भावों का कर तर्पण कहो कोई कैसे मुस्काए।
इच्छाओं को जीते जी मरघट में कैसे दफनाए।
पुर्णता से लबरेज यह संसार उसे क्योंकर लुभाए।
उन्मुक्त बचपन की तरंगें हरपल जिसे पास बुलाए।
कुछ रिश्ते मरे तो कुछ वेंटिलेटर पर पड़े है।
तुम ही कहो हम कैसे मंगल गीत अब गाएं।
हाथ उठा आत्मसमर्पण कर दिया उसे,
माफी देकर फिर से अपने गले लगाएं।
मां सच कहूं तो खुद को सम्भालने में
बहुत-बहुत मस्सक्त करनी पड़ती है।
आसानी से दूसरों को समझा सकते हैं।
अपनी बारी आती है तो ऐसा लगता है
सुलझाने में उलझने और बढ़ती जाती है।
बचपन को अर्पित कर ,
जो उन्मुक्त यौवन पाए।
धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष कर दूं समर्पित-
यदि बचपन दुबारा लौट कर आए।
समझ नहीं आता है अब तुम ही समझाओ।
मेहरबानी करके प्रभु मुझे तुम राह दिखाओ।
जब जग था तो तू नहीं।
तूं है तो अब जग नाही।
दोनों मिल जाए 🙏प्रभु।
ऐसी मेरी किस्मत नाही।
सब कहते हैं वह निराकार है।
साकार तुझे दिख सकता नहीं।
हर क्षण साथ रहने वाला भगवान,
क्यों साकार हमें दीख सकता नहीं।
यह कैसी मजबूरी है वो सरकार ,
सर्वव्यापी है पर दिख सकता नहीं।
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