बचपन के साथ कितना कुछ खिसक गया,
दोस्त तेरे वगैर खालीपन जीवन में भर गया।
वो अल्हड़पन,चाहत, वो ख्वाब कहां चले गए।
मन के खालीपन में अनिच्छा घर जो कर गए।
मेरा अस्तित्व ना रहा ? रीठ की हड्डी ना रहीं ?
जिस राह पर चले, हम फिसलते ही चले गए।
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| Kagaj kalam kuchh tasveer |
अपने सर पर चढ़ाने वाला क्या गया ?
अस्तित्व अपना खुद से पहचाना नहीं गया।
इतना झुकाया खुद को, रीठ की हड्डी मेरी,
अपने स्थान से खिसकती ही चली गयी।
मारा ना अपने आप को ज़हर भी ना पीया।
बार-बार टूटता बिखरता समेटता ही रह गया।
अगर तुम आओगे तो पाओगे मेरे गरीब खाने में।
कुछ कागज़, कलम कुछ तस्वीरें है बुतखाने में।

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