मैं जो कहूं तुम कर लेगी क्या?
हम अपनी लिखावट सुधारते रह गए।
सारे कॉपी आंसुओं से भर गए।
पन्ने खतम होने पर जब उठाई नज़र।
कॉपी ज़ब्त करते गुरुजी दिख गए।
थक चुकी हूं बेमानी की चाल से।
खेल में हिस्सा नहीं लेने वालों को।
पुरस्कार जीतने का तमाशा देखते रह गए।
इमानदारी के सुरीली गीत हम गाते रह गए।
शाम होने से पहले घर लौटने का आदेश था।
खेल बीच में छोड़कर घर हम भागते रहे।
सारे दोस्त आगे निकल आकाश छू लिए।
हम अल्फा,बीटा,गामा में उलझे रह गए।
किसी ने कहा- जीवन ईश्वर का दिया तुम्हें उपहार है।
किसी ने समझाया- केवल कर्म पर तेरा अधिकार है।
सबको खुश रखने की चाह में,
अच्छे बुरे सारे कर्म हम करते रहे।
मंदिर मस्जिद गिरजाघर हो चाहे हो गुरुद्वारा,
सर झुकाकर मांगी हमने सबके लिए दुआ।
ज्ञात हैं ईश्वर समर्थवान है,
सब कुछ आपके ही हाथ है।
वावजूद इसके अपने लिए,
कुछ मांगने से हम डरते रहे।
हिमालय सा उंचा अस्तित्व लेकर जग में आया था।
किस्मत का भी धनी था मैं यारो,पर था मैं बुद्धिहीन।
मेरी चाल हुई ग़लत हमेशा, ग़लत हुई हर राह।
शतरंज के खेल में सब थे, यहां शकूनी के बाप।
मुसीबत के खाइयों में, अस्तित्व का हुआ ऐसा हाल।
बारम्बार संभाला कर्ण के पहिए सा हुआ मेरा हाल।
एक जाना-पहचाना स्पर्श हाथों को था खींच रहा।
जिंदगी पूछ रही थी - क्या मुझसे पीछा छुड़ाना हैं ?
ऐसा लगता सियासत सीखी है जिंदगी
तुमने भी क्या इस ज़माने से,
मैं कहूंगा वैसा तू कर लेगी क्या ?
मैं ना रहूं फिर भी तू जी लेगी क्या?
मेरी मौत आने से पहले रमणबिहारी से मिलवाएगी क्या?
मौत आने से पहले रमणबिहारी को यहां तू लाएगी क्या ?

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