बसीर बद्र साहब को 🙏 श्रद्धांजलि ❤️


कोई हाथ ही ना मिलाएगा, कि गले मिलोगे तपाक से।

यह नए मिजाज का शहर है, जरा फासले से मिला करो।


तमाम उम्र बीत जाती है,एक घर बनाने में।

तुम तरस भी नहीं खाते बस्तियां जलाने में।

                            बसीर बद्र 🙏


अब समय बदल गया है, इंसान भी बदल गया है।

यूं सादगी से एक शायर ख़ुदा की खिदमत में गया,

जिसके ---

हर लफ़्ज़ मोहब्बत से लबरेज थी हर शेर में दुआ।


ज़माना भले भूल जाए चेहरे की पहचान,

पर उसकी ग़ज़लों में धड़कता है ऐजहान।


दो गज़ ज़मीन मिली यहां, वहां जन्नत नसीब हो।

महफ़िल में जिसने हर दिल में थी जगह बनाई।


बसीर बद्र—एक नाम नहीं, एक एहसास है,

दिलों में बसता है, जो अश्कों में उजास है।


वो गया कहां है ? नज़्मों में रहेगा सदा जिंदा।

हर इश्क़, हर दर्द, हर मोहब्बत में पिन्हा हैं।


आप हरेक दिल और जुबा पर आप रहेंगे जिंदा।

वादा करें बसीर साहब🙏आप फिर आएंगे यहां।


                               नगीना