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ईश्वर पर जाकर खत्म होता है

 


छूना नहीं जिसे देखना सुकून हो

छूना नहीं जिसे देखना सुकून हो तुम,

दूर रहकर भी कितने करीब हो तुम।


तेरी एक झलक पाने की आश लिए,

अपनी आंखों पर अटूट विश्वास लिए,

ना तुम्हे पाने की ज़िद है सदा के लिए।

बस तुम्हें चाहते जाते है सुकून के लिए।


ना कोई रिश्ता ना कोई बंधन ना कोई ख्वाब,

बगैर कहे एक- दूसरे को समझना सुकून है।


अत्यधिक प्रेम में इंसान इतना बदल जाता है।

तुलसीदास सा उसका आत्मसम्मान खो जाता है।


वहीं इंसान अगर इस प्रेम से बचना चाहता है।

बहाने बना दूरी बनाने की कला सीख जाता है।


वह भूल जाता है प्रेम की शुरुआत इंसान से होता है।

प्रेम इंसान से चलकर, ईश्वर पर जाकर खत्म होता है।

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