जंगल की राहों में मैं अकेली चली,
पेड़ों की छाँव, हवा के साथ खेली।
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| मैं यहीं हूं |
डर था कहीं कोई जानवर न आ जाए,
गिलहरी की चंचलता मेरे मन को भाए।
मंदिरों की झलक, देवताओं का संग,
कृष्ण, बजरंगवली देख, मन में उमंग।
श्रद्धा की धारा बहती रही मेरे भीतर,
हर आहट में लगा कोई है समीपतर।
छोटी बहन आई चाय का प्याला लिए,
हाथ को छूकर जैसे कह रही हो— "मैं यहीं हूँ तेरे लिए।"
उस स्पर्श में था अपनापन गहरा,
जैसे आत्मा ने आत्मा को छुआ।
फिर आई मन में शांति,अपूर्व,अनोखी,
मन की लहरें थमीं तो सांसें हुईं धीमी।
पहली बार ध्यान ने ऐसा रंग दिखाया,
भीतर के आकाश को बाहर से मिलाया।

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