सालों पहले बंद कर दिया था
अपने आनंदित मन का कपाट।
एक झोके ने तोड़ डाले सांकल,
समझ चुकी थी जीवन का सार,
संसार के इर्द- गिर्द घूमता मन।
मेरा मार्गदर्शन कराती वो दो आंखें,
करवा गई वास्तविकता से सामना।
मन स्वभावगत आनंदभोगी होता है।
पल-पल अपना रुप बदलता रहता है।
छिपा रखता है अव्यक्त प्रेम, पराजित आकांक्षाएं।
आसान नहीं उसके सच्चे स्वरूप को पहचानना।
यदि मन टकरा जाता है अपने परित्यक्त स्वरुप से,
सोचता है शायद मेरा रुप ही है तन्हा पंछी की तरह।
इस क्षणभंगुर संसार से अप्रभावित रहना।
सुमार्ग पर अडिग दृढ़ प्रतिज्ञा चलते रहना।
चलते-चलते समझा जाती है जिंदगी का अर्थ,
हर उद्देश्य पूर्ती हेतु डर नहीं निर्भिक रहना।
पुरानी इमारत या पुराने लोगों को यादों में रखना,
कर्मानुसार ही मिली है, हम सभी को यह जिंदगी,
वक्त रहते सीढ़ियों पर एक-एक क़दम चढ़ते रहना।
जैसी है भली या बुरी सजदे में सिर झुकाए रहना।
अपने भीतर के जर्जर खंडहरों की यात्रा करते रहना।
अंतिम द्वार में मृगतृष्णा मिले या मुक्ति देखते रहना।

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