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नरक में कूंच हम कर गए

 दांव पेंच के खेल में हम हमेशा अनारी रहे।

झूठ को सच साबित कर वो मुस्कुराते रहे।


अदालत की अदाकारी से कातिल बच गए।

हत्या को आत्महत्या साबित कर निकल गए।


वकील जो मैंने रखें थे उनके सगा निकल गए।

मरनेवाले को भी वकील जीत का ख्वाब दे गए।


उम्मीदों की आश लिए हम जेब टटोलते रह गए।

अदालत मैं क्या गया? मुझे खुद के दर्शन हो गए।


सुन रखा था मैंने अदालत ख़ुदा का दरबार है।


खुदा का गर दरबार है तो यह कैसा इंसाफ़ है?


जिस- जिस पर भरोसा था गवाही देने आएंगे।

वक्त आने पर सब अपने बहाने बना मुकर गए।


गमी में आंसू बहाने वाले सभी लगते थे अपने है।

श्मशान में कंधा देने से पहले सब किनारा कर गए।


तेरहवीं में उनको शाय़द घरवाले बुलाना भूल गए।

अपनों से निमंत्रण कैसा?थाली पर एहसान कर गए।


आत्मा को स्वर्ग पहुंचाने की कीमत ही कुछ ऐसी थी।

घरवाले गिरगिराते रहें पंडित जी तूनक कर घर गए।


अब और क्या बचा जो आप सब बैठे हैं सुनने को,

स्वर्ग का ख़्वाब था दोस्त नरक में कूंच हम कर गए।

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