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| Waqt ki maar |
जान ना पहचाना पर सम्बन्ध उससे पक्का है।
जिधर देखूं वहीं नज़र आए यह बात पक्का है।
खुदा का संसार में मैं हूं, एक संसार मुझमें है।
ना संसार मेरे काम का, ना मैं संसार के काम की।
आत्मसम्मान पर लगा ज़ख़्म के पास,
आखों में नींद और माफी नहीं होती।
जिम्मेदारी की थकान सोने नहीं देती,
त्याग सीखना नहीं पड़ता किताबों से,
वक्त की मार त्यागना सीखा जाती है।
पुरुष हो या स्त्री मजबूत पैदा नहीं होते,
दर्द और हालात ही उसे कठोर बनाते हैं।
एक हद के बाद मोह,लगाव उम्मीद ही है।
जो इंसान को बंधन से मुक्त कर जाते हैं।

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