कागज़ कलम दे दो मुझे,
कागज़ कलम दे दो मुझे,
अपनी थकान लिखना है।
कितने ज़ख्म सहे हैं मैंने,
कितने रैन जगे है नैना,
उनका हिसाब लिखना है।
क्यों अकेलापन भाता है अब मुझको?
क्यों मिलना-बिछड़ना है समभाव मुझे?
कागज़ कलम कोई दे दो मुझे,
व्यक्त करना है अपने भाव मुझे।
मरना चाहो तो मरने भी कहां देता।
ऐसा तो मिला है संविधान मुझे।
औरों के शर्तो पर जीना नहीं कबूल हमें।
अपने शर्तों पर जीने का नहीं अधिकार हमें।
ना इरादे कमजोर है मेरे,
ना मुझे आलस ने घेरा है।
मन पर अदृश्य भार है मेरे,
मन को बारम्बार रोकना-टोकना भारी पड़ा है।
जिंदगी तेरी राह में कांटा बिछाना भारी पड़ा है।
तुम्हारे बिन घर सुनसान पड़ा है।
दरो-ओ-दीवार पर जाले लगे हैं।
खुशी ने छूना बंद कर दी,
आंखों में आंसू रहे नहीं।
हारने के बाद कहां जाय,
सामने यह सवाल खड़ा है।

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