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Kirdar apna Sahi rakhna sikhiye
तन और मन का अलग -अलग दर्शन
जज़्बात को महज़ अल्फ़ाज़ समझ बैठे
हम जो कहते रहे तुम सुनते रहे
मेरी मैय्यत में जी भर रोया
डिजिटल यमराज जी और मैं
 दे सको तो देना नहीं तो Let it Go
Hamne dhero sapan sajaye
रुह में जो बसे नहीं
कागज़ कलम से ना अपनापा होता